Md. Mustafiz Raza

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Wednesday, August 15, 2018

LAASH (A MAGIC)

जन्म हुवा मेरा अवश्य लाश बनूँगी
अभी तो हूँ छह वर्ष की
पता नहीं कब हो जाऊं स्वर्ग लोक की



        मेरे घर में बोहोत सारी लाशें आती हैं

        उन्हें देख मए घबराजाति हूँ



पर क्या करूँ बाबा का काम है ऐसा

करे न इसे तो मिलेगा न पैसा



        इस काम से हम दोनों की पेट भर जाती है

        भीक मांगने की ज़रूरत नहीं आती है



अब तो जाड़े का समय आ गया है

हमें पेट भरने को खाना मिल गया है*



        जाड़े के समय काम बढ़ जाती है

        कई अनात, बेसहाराओं की लाश मिल जाती है*



जब जाड़े में मुझे ठण्ड लगती है

मए उन् लाश के साथ चिपक कर सो जाती हूँ



        लाश करवटें नहीं लेती, लाश परेशान नहीं करत

        जब आखरी बार मै मेरी माँ के साथ चिपककर सोइ थी
        तो उन्होंने भी करवटें नहीं ली थीं



आज उनकी याद दिलाती है यह लाशें

आराम से सुलाती हैं ये लाशें



        जब एक दिन लिपटी सो रही थी लाश पर

        फेक दिया मुझे भी तालाब पर
        रात भर ढूंढा बाबाने मुझे
        फिर जाके मिली कहीं तालाब पर



उपलते लाश की साँसे तो रुकी हुई थी

पर उसने मेरी चलने दी थी



        कहते हैं लोग मर जाने के बाद कुछ नहीं कर सकते

        पर जो निर्जीव कर जाते हैं
        वह तो जीवित भी नहीं कर सकते

written by A Magic (Pen name)

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